प्रस्तावना

बचपन के सावन बीते, लड़कपन की बीती धारा
जब मुड़के देखा पीछे, तो छूटा जीवन सारा

अली ज़फ़र की इन दो पंक्तियों का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। दरअसल एक अर्थहीन जीवन जी लेने के विचार से ही मन विकल हो उठता है।

यह तो सत्य है कि हमें किसी ना किसी दिन संसार छोड़कर जाना है। तो फिर हमने आजीवन जो भी अर्जित किया हैं, उसका अर्थ ही क्या है? इस प्रश्न ने मुझे कितनी ही बार मथ डाला। जब-जब मैं इस विषय पर विमर्श करती, एक ही उत्तर मन में टिमटिमाता: अपने सभी अनुभवों को किसी तरह संगठित करना होगा। लेखन अमरत्व का एक माध्यम है। मेरी कृतियों के माध्यम से मेरे जीवन-यात्रा की एक स्मृति रहेगी, एक छाप रहेगा। संभवतः मेरी यह कृतियाँ आने वाले कल में किसी को प्रभावित कर सके। शायद मेरी त्रुटियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख बन जाएँ। यदि ऐसा हुआ, तो मेरा प्रयत्न दुगुना अर्थपूर्ण हो जाएगा। इसलिए मैं इस किताब को लिखने के प्रयत्न में जुट गई।

मेरे जीवनभर के यात्रा वृतांत इसी किताब में लिपिबद्ध है।