शाकाहारी भोजन: एक चुनौती

वियतनाम में आसानी से नहीं मिलता हमारा शुद्ध-शाकाहारी, निरामिष भोजन। इसकी अनुपलब्धता ने मुझे और मेरे साथियों को बार-बार सांस्कृतिक भिन्नताओं का स्मरण कराया। दरअसल पूरी यात्रा के दौरान, भोजन-क्रिया संवाद का एक प्रमुख विषय बना रहा। हम सब अपनी भिन्न-भिन्न प्रंपराएँ लेकर आए थे। हमारे ग्रुप में मेरे अतिरिक्त एक अन्य साथी शाकाहारी था, और हमारे चार मुस्लिम मित्र ‘हलाल’ भोजन का सेवन करते थे। वियतनामीस लोगों के लिए हमारी आहार पद्धति जिज्ञासा का विषय था। इसी तरह, हलाल भोजन के प्रति मेरी जिज्ञासा जागी।

अधिकांश लोग यह जानते हैं कि हलाल भोजन में सुअर के मांस का सेवन निषिद्ध है, परंतु उनका एक और महत्त्वपूर्ण नियम है: मांस को काटने की एक निश्चित विधि। उनके निर्धारित काटने के तरीक़े से जानवर को कम से कम पीड़ा पहुँचती है। वे केवल उन्हीं स्थानों पर भोजन करते जहाँ सरकार द्वारा प्रमाणित हलाल का स्टैम्प हो। उनकी दृढ़ता वास्तव में सराहनीय थी। जहाँ मेरे मित्र अपने सिद्धांतों पर दृढ़ थे, मैं परिस्थितियों के प्रवाह में बह जाती।

एक-दो बार तो जाने अनजाने में मैंने शंखमीन और झींगी मछली का सेवन किया। वियतनाम में ज़्यादातर व्यंजनों में मछली या झींगे मछली के अंश पाये जाते हैं, चाहे वो खाने में प्रयोग होने वाला तेल हो या नमक और मिर्ची का मिश्रण। ऐसी स्थिति में दृढ़ से दृढ़ मनुष्य भी समायोजन करना सीख जाता है। अगर किसी ने हमसे कह दिया कि भोजन शाकाहारी है, तो हमने उसे शाकाहारी मानकर स्वीकार कर लिया, भले ही हमारे मन में संशय बना रहा। कितनी बार तो हमारे लिए विशेष अनुरोध किया गया था। एक शाम, हा लौंग बे की लंबी यात्रा बाद, हमें एक आलीशान बफे के लिये लेजाया गया था। हमारे टूर गाइड ‘मिस्टर डिलीशियस’ ने रसोई में विशिष्ट अनुरोध कर बड़े ही प्रेम-भाव से मुझे और मेरे साथी को शाकाहारी भोजन परोसा।

नियमित तौर पर हमारा लंच विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किया जाता था। उन्होंने अपनी ओर से निरामिष भोजन के प्रबन्धन के लिए पूरा प्रयत्न किया था। हालाँकि उनकी व्यवस्था हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। हमें ज़्यादातर चावल और कुछ उबली सब्जियाँ मिलीं। हमने उसे स्वीकार किया क्योंकि वो सम्मान और सद्भावना के साथ परोसी गई थीं। हाँ, उन्होंने हमारे प्रतिपुष्टि को ध्यान में रखा। नमक और मसालों की कमी को मैंने नम्रता से व्यक्त किया, और परिणामस्वरूप हर दिन फ़्रेंच फ्राइज़ हमें “नमकीन” के रूप में मिलने लगे। मगर एक दिन उनकी व्यवस्था ने मुझे सचमुच क्रोधित कर दिया। उस दिन हमारे भोजन के लिए कोई सब्ज़ी या पत्ता भी नहीं था। केवल चावल और रतालू के लड्डू। तब तक मैंने हमेशा विनम्रता से बात की थी, लेकिन उस दिन मुझे अपनी बात दृढ़ता से रखनी पड़ी। कृतज्ञता का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने अधिकार और आवश्यकताओं के लिए आवाज़ न उठाएँ। मेरे कठोर शब्दों का परिणाम था कि अगले दिन से हमारे लिए बेहतर भोजन का प्रबंध किया गया।

विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि हमारी सहायता करना चाहते थे, इसमें संदेह नहीं। वे बस हमारे आहार नियमों को समझने में असमर्थ थे। और शायद, हर यात्रा का सार यही होता है – हर अनुभव को अपनी सीमाओं में स्वीकार करना, और जितना हो सके, आभार व्यक्त करना। यही वह दृष्टि है, जो यात्रा को स्मरणीय बनाती है, और जीवन को एक उच्चतर अर्थ प्रदान करती है।

हमारे आहार के प्रति उन्होंने बड़ी ही जिज्ञासा ज़ाहिर की। एक दिन, हा लौंग बे के यात्रा के दौरान, हमने टी-टॉप आइलैंड के सबसे ऊपरी शिखर पर जाने का निर्णय किया। वह कुछ एक-सौ-दस मीटर की ऊँचाई पर था। बड़े ही स्फूर्ति के साथ हम अन्य सैअलनियों के भीड़-भाड़ में सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। इस दौरान हमारे वियतनामिस दोस्त ने मेरी ओर देखकर कहा “स्नेहल, तुम शाकाहारी हो, पर तुम कितनी ताक़तवर हो।” उसका यह कहना अपमानजनक नहीं बल्कि प्रशंसात्मक था। हालाँकि, इसमें यह आम धारणा भी झलक रही थी कि एक शाकाहारी व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर होता हैं, या उसे पोषण की कमी होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह अवधारणा पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि बहुत से शाकाहारी लोग अपनी पोषण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दवाइयों का सेवन करते हैं। लेकिन मैं टी-टॉप आइलैंड के शिखर की आधी दूरी तय की, सैलानियों के भीड़ भाड़ में, हाँफते-हाँफते खड़ी, उससे यह सब कैसे व्यक्त करती। मैंने मुस्कुराते हुए बस इतना कहा, “जो भोजन आप लोगों ने हमें खिलाया है, उसी ने मुझे यह स्फूर्ति दी है।”

दरअसल हनोई जाकर मुझे एहसास हुआ की कभी कभी अनुकूल रहना कमज़ोरी नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता है।

85 thoughts on “शाकाहारी भोजन: एक चुनौती”

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