हनोई: भाषा, समाज, संस्कृति

कुछ यात्राएँ हम तय करते हैं, और कुछ हमारे लिए तय की जाती है। हनोई की यात्रा मेरे जीवन की सबसे अप्रत्याशित यात्रा थी। अपने विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित इस यात्रा में मेरा आवंटन किया गया था, जबकि मैंने अपने आवेदन में हनोई के शहर को नहीं चुना था। विडंबना यह है कि हनोई की यात्रा मेरे जीवन की सबसे उल्लेखनीय यात्रा रही है।

भाषा और समाज अलग नहीं बल्कि अवियोज्य है। हनोई में बोली जाने वाली वियतनामीस भाषा और हमारी हिंदी के बीच एक भाषाई अंतर मुझे गहन चिंतन के लिए प्रेरित करता रहा। जैसे हमारी हिंदी में संबोधन के लिए ‘आप’, ‘तुम’, और ‘तू’ का प्रयोग होता है, वैसे ही वियतनामीस में ‘तोई’, ‘ऐम, ‘ची’ और ‘आँह’ का उपयोग होता है। अंतर यह है कि यह शब्द स्वयं के लिये प्रयोग किये जाते हैं। दूसरे को बड़ा या छोटा बनाकर संबोधित करने की जगह वे स्वयं को झुकाकर आदर प्रकट करते हैं। दरअसल हनोई पहुँचते ही, यहाँ के लोगों की विनम्रता और अतिथ्यकारी की भावना ही सबसे सुव्यक्त थी। यही बात सबसे पहले उभर कर आयी, और पूरी यात्रा के दौरान मैं इसी बात से बार-बार परिचित होती रही। कृतज्ञता, नम्रता और शिष्टता, यही तीन गुण वियतनामीस लोगों को परिभाषित करते हैं। परंतु जब मैंने अपने इस प्रेक्षण को एक वियतनामी युवक के समक्ष रखा, तो उसने बड़ी तत्परता से इसका खंडन किया। उसका कहना था कि उनके विनम्र और शिष्ट व्यवहार का कारण केवल यह है कि हम उनके देश में मेहमान हैं। मैं उसकी इस बात को पूरी तरह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थी। मेरे अनुभव में उनकी शिष्टता स्वाभाविक थी और मात्र औपचारिकता भर नहीं हो सकती थी। 

इस द्वंद्व को सुलझाने और अपने दृष्टिकोण को और व्यापक बनाने के लिए, मैंने रविवार के दिन हनोई को स्वयं के लिए अनुभव करने का निश्चय किया। मैंने सोचा कि विश्वविद्यालय के छात्रों से परे, आम वियतनामी लोगों के साथ संवाद स्थापित करूँ और उनके समाज व संस्कृति की अनकही परतों को समझने का प्रयास करूँ। उस दिन ने मुझे अपने प्रेक्षणों की पुष्टि और संशोधन करने का अवसर प्रदान किया। हनोई की गलियाँ, वहाँ के बाज़ार, और साधारण जनजीवन—इन सब के बीच छिपे अर्थ और अभिव्यक्तियाँ मेरे सामने धीरे-धीरे खुलने लगे।

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