172 कि.मी. का लंबा सफ़र। तिस पर ठंड से थर-थर काँपती देह, कॉफ़ी और ब्रेड से पेट आधा-अधूरा भरा, और पाँच-छह रातों की अधूरी नींद लिए हम सारे। फिर भी मन उत्सुक था – हम हा लौंग बे जा रहे थे।
पीछे छूट रहा था हनोई, वियतनाम की राजधानी जहां हम दो हफ़्तों के लिए टिके हुए थे। हम अपने विश्वविद्यालय और ‘वियतनाम नेशनल यूनिवर्सिटी’ द्वारा आयोजित किए गये एक दिसंबर कार्यक्रम के लिए हनोई आये थे। यह एक शैक्षिक कार्यक्रम था लेकिन हम इसके दौरान हनोई के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं से परिचित होते रहे।
जैसे-जैसे बस हा लौंग बे की ओर बढ़ती गई, खिड़की के बाहर का परिदृश्य बदलते गया। छूटती गई हनोई की वो संकरी गलियाँ, जो सवेरे के छः बजे भी मोटरबाइक से भरी रहती थी। आगे के रास्ते में फैले हुए धान और चावल के खेत खुलते गये। कभी-कभी कोई अकेली साइकिल खेतों के किनारे चलती दिखती, पीछे लकड़ी का टोकरा या धुंधली आँखों वाला कोई वृद्ध। कुछ घर, जो ईंटों से बने कम और समय के हाथों से गढ़े हुए अधिक जान पड़ते थे, बस की गति के साथ पीछे छूटते जाते। और मैं, उस खिड़की के पार देखते हुए, इस परिवर्तनशील दृश्य में कुछ स्थायी ढूँढ रही थी, शायद किसी मन:स्थिति की प्रतिछाया, जो उस सफ़र की थकान और आकांक्षा दोनों को समेट सके।
हा लौंग बे अभी दूर था, पर उसकी आहट, कहीं बहुत भीतर, पहले से सुनाई देने लगी थी।